खड़ी पहाड़ी,दुर्गम रास्ता और गहरी आस्था: चाचमऊ की प्राचीन भोलेनाथ गुफा आज भी रहस्य और श्रद्धा का केंद्र

खड़ी पहाड़ी,दुर्गम रास्ता और गहरी आस्था: चाचमऊ की प्राचीन भोलेनाथ गुफा आज भी रहस्य और श्रद्धा का केंद्र

चाचमऊ की यह भोलेनाथ गुफा आज भी उतनी ही रहस्यमयी है,जितनी वर्षों पहले रही होगी

चाचमऊ से लौटकर प्रमोद गुप्ता की रिपोर्ट

सारनी।सीहोर जिला की बुधनी तहसील अंतर्गत शाहगंज ब्लॉक के सात गांवों के बीच बसा चाचमऊ करीब 450 की आबादी और मात्र 20 मकानों वाला छोटा-सा गांव आज अपनी दुर्गम पहाड़ी पर स्थित आस्था के केंद्र भोलेनाथ गुफा मंदिर के कारण पहचाना जाता है।
गुफा तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं। गांव से लगभग ढाई किलोमीटर पत्थरीले पथ के बाद तीखी चढ़ाई शुरू होती है। हर कदम पर सांसें तेज होती हैं,लेकिन हर-हर महादेव और बोल बम के जयकारों के साथ थकान मानो खुद ही हार मान लेती है। चारों ओर घना वन और पहाड़ी भू-भाग इस यात्रा को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।ग्रामीणों के अनुसार,गुफा में पहले एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित थी।

मान्यता है कि करीब 25–30 वर्ष पहले एक आदिवासी महाराज के माध्यम से उस शिवलिंग को यहां से ले जाया गया। तब से यह स्थल रहस्य का विषय बना हुआ है,क्या शिवलिंग स्वयंभू थी,क्या यहां भगवान शिव ने तप किया ऐसी अनेक कथाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं।महाशिवरात्रि के अवसर पर इस दुर्गम स्थल पर आस्था का सैलाब उमड़ता है। प्रशासनिक और स्थानीय अनुमान के मुताबिक,उस दिन 35 से 40 हजार श्रद्धालु गुफा तक पहुंचते हैं।कोई नंगे पांव, कोई जयकारों के साथ,तो कोई थककर क्षण भर ठहरता है और फिर आगे बढ़ जाता है। गुफा के समीप पहुंचते ही ठंडी हवा का झोंका और भीतर की शांति श्रद्धालुओं को एक अलग अनुभूति कराती है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल मंदिर नहीं,बल्कि विश्वास की परीक्षा और श्रद्धा की चढ़ाई है!जहां पहाड़ से भी ऊंची आस्था दिखाई देती है।चाचमऊ की यह भोलेनाथ गुफा आज भी उतनी ही रहस्यमयी है,जितनी वर्षों पहले रही होगी और शायद इसी रहस्य में इसकी सबसे बड़ी शक्ति छिपी है।

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